दिल चाहता है… माँ

दिल चाहता है… माँ

आज फिर मन में उठा भावनाओं का तूफ़ान है…
मेरी नज़रों से ओझल हो रहा वो इंसान है।

घर पर रहकर, घर की कमी क्यों महसूस हो रही है?
शायद वो शख़्स मौजूद नहीं है…
जिसने इस घर को घर बनाया था।

बात करना चाहती हूँ, लेकिन गला भर आता है,
ये दिल अब मां से बिछड़कर बहुत पछताता है।

युँ तो लाख शिकायतें थी मुझे उनसे… लेकिन,
उनकी नामौजूदगी की शिकायत लेकर किसके पास जाऊँ?

परेशानियाँ तो मेरी जिंदगी में पहले भी आती थीं…
शायद वो मेरी माँ ही है… जो मेरा हौसला बढ़ाती थी।

बस एक बार उनके गले लगने को जी चाहता है,
ये दिल बस उनसे लिपटकर बस जी भर रो लेना चाहता है।

ठोकरें तो पहले भी लगी हैं राहों में,
लेकिन इस बार, सिर्फ़ इस बार…
दिल हार मान लेना चाहता है।

ये निराश मन बस उनके चेहरे का भाव देखना चाहता है,
हमेशा उनके पास रहने का वरदान चाहता है।

अब थक गई हूँ, राहों की धूप में अकेले चल कर…
ये मन अब बस उनके आँचल की छाँव चाहता है।

एक अँधेरे कमरे में गुम मैं खुद को पातीं हुँ,
वो बस किसी तरह मुझे ढुँढ ले… ये चाहती हुँ।

अब मन फिर से डांट खाकर, रूठने को चाहता है…
और फिर उनके हाथ का खाना खाकर,
मान जाने को चाहता है।

क्यों छोड़ा मैनें उनका आँचल, मैं अक्सर ये सोचा करती हूँ…
शायद मैनें सोचा वो थाम लेंगी मुझे,
जैसे बचपन में थामा करती थीं।

ये नीन्द ना आने की बीमारी मुझे अक्सर सताया करती है,
मेरी माँ की लोरियाँ मुझे बहुत याद आया करती हैं।

ये शान्त मन बस सुनना एक शोर चाहता है… और
ये कान सुनना बस एक ही शोर चाहते हैं…
ये सुनना उनके पायल की आवाज़ चाहते हैं।

जब भी कोई अपनी माँ के किस्से बतलाता है,
मेरा मन बस दौड़कर जाकर…
माँ को गले लगाने को चाहता है।

ये निराश मन बस फिर से खुशहाल होना चाहता है,
बस, सिर्फ़ बस,
इतना सा वरदान चाहता है…
माँ को मिलना चाहता है..
उनको देखना चाहता है।।

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